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Wednesday, February 24, 2010

बस भी करो..........

कल अखबार में पढ़ा,कसाब की मेहमान नवाजी में अब तक ३९ करोड़ खर्च कर चुकी सरकार.
.........लेकिन जनता के हवाले सिर्फ महंगाई की मार.
मैं वाकई कभी कभी सोचता हूँ,क्या सच में कसाब के ऊपर होने वाला खर्च इतना ज्यादा हो सकता है?
कसाब को जिन्दा रखना हमारे लिए क्यूँ जरूरी है?
मानवाधिकार के रक्षकों के लिए कसाब के कृत्य क्या अब भी मानवीय लगते हैं?
लेकिन उसे जिन्दा रखना बहुत जरूरी है,उसे जिन्दा रखेंगे तभी तो उस मामले से जुड़े हुए तमाम लाभार्थी लाभान्वित होंगे.
आप आखिर उससे क्या उगलवा लेंगे,जो आपको पता नही है.
आखिर क्यूँ कर इतना इंतजाम किया जा रहा है,उस कातिल के लिए,जिसने हमारे जिगर को छलनी कर दिया...
मानवता खुद लज्जित हो जाती है,इनके गंदे कारनामो से,और उन वहशी इरादों को पनाह देने वाले को इतनी महँगी जिंदगी दिया जाना उस देश में,जहां अर्थ के अभाव में लोग घुट घुट कर जीने को  मजबूर हैं,उनके मुंह पर बेशर्मी भरा एक तमाचा नहीं तो और क्या है?
लेकिन तुम उसे जिन्दा रखोगे.
क्यूंकि तुम टैक्स नहीं देते ना,तुम तो लोगो के मेहनत से जमा किये टैक्स पर ऐश किया करते हो.
जो रोटी रोटी का पैसा जोड़ता है ,उसके लिए ३९ करोड़ पूरी जिंदगी का अनछुआ ख्वाब बन कर रह जाता है.
शहीद सुर्ख़ियों में तभी तक रहते है,जब तक अगला शहीद ना हो जाए,लेकिन मीडिया और सरकार के रहमोकरम से ये दरिंदा अब तक शोहरत बटोर रहा है,और ऐसी जिंदगी जी रहा है,जो उसने कभी सोची भी नहीं होगी,उसके अपने देश में आज लोग दाने दाने को मोहताज हैं.
पूछो उनसे जिसने इन हमलों की पीड़ा महसूस की है,क्या अंजाम हो इस कातिल का,और सुना दो फैसला......
यह बेशर्म कानून के मंदिर में साफ़ झूठ बोलता है और मुस्कुराते हुए बाहर आता है,फिर भी तुम्हें शर्म नहीं आती.
शर्म करो,मुझे तो आ भी रही है....कि हाय मेरे देश के भाग्य विधाताओं,किसी जरूरतमंद के हक़ का हिस्सा काटकर अब तो दरिन्दे का पेट भरना बंद करो..
जिन्दा रखना ही है तो तामझाम पे तो रोक लगाओ,जिस रकम के लिए आम आदमी जिंदगी भर जोर लगाकर थक जाता है,उसे कम से कम एक आतंकवादी के नाम पे तो मत लुटने दो.
यूँ ही किसी घोटाले के नाम पे खा लो,वैसे भी अब तक तुम्हारी दौलतों में आशातीत उफान आया तो कोई पूछने नहीं गया.
अब भी नहीं पूछेगा,बस उस दरिन्दे को थोडा कम खिलाओ.
तुम्हारे इस उपकार से आतंकवाद की कोई जड़ कमजोर होती नजर नहीं आ रही.
तरस खाओ,उन पर जो पैसे के अभाव में रोटी को तरसते रहते हैं,और वो दरिंदा तुम्हारी दया से बोटियाँ नोच रहा है,मुंह चिढाते हुए.

1 comments:

Suman Dubey said...

rahul ji namaskaar, aapne sahi likha par sakaare sach se hi to bhaagati rahi hai .

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