बेतिया शहर,भारत-नेपाल सीमा के नजदीक बिहार के अंतिम सिरे पे स्थित है..कहने को यह बहुत बड़ा शहर नही है,लेकिन यदि कभी दिन में यहाँ की ट्रेफिक में फंस जो गये,तो आप भी मान जाओगे की सुविधा भले ही यहाँ महानगरो वाली ना हो लेकिन असुविधाएं पर्याप्त हैं..
और यहाँ की पुलिस भी आये दिन खुद पहल कर इस व्यवस्था कों सँभालने का जिम्मा उठती है.....ह़र एक दो महीने में कभी एक बार मैं पुलिस की वैन चौराहे पे खड़ी देखता हूँ,मेरे कई परिचित बिना ड्राइविंग लाइसेंस के धड़ल्ले से घूमते हैं,हेलमेट लगाना तो शायद उन्हें कभी हजम ना हो,और सही कहूं तो वो इसे अपनी शान के खिलाफ समझते हैं.
तो मेरे उन मित्रो में से कितने कई बार बिना कागजातों के गाडी चलते पाए गए,लेकिन अगले दिन वे अपनी बाइक पे उसी रोड पर हमेशा चलते ही रहते हैं,और अगले दिन क्या फिर हमेशा ही यूँ ही घूमते रहते हैं,और तब रोकने वाले भी नदारद होते हैं.
मुझे ये भी नही पता की हर बार पकडे जाते हैं फिर भी कैसे बच जाते हैं,शायद इन्ही परिस्थितियों से गुज़र कर किसी ने ये मूल मंत्र दे दिया लोगो कों'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी..........."
अब बताओ भला गांधीजी से बढ़कर किसकी मजाल जो उनका आदेश ना माने,मान जाते हैं सभी.
वैसे बाकी दिनों में भी कुछेक चौराहों पर पुलिसिये मुस्तैद रहते हैं,लेकिन भारी वाहनों की आवाजाही दिन भर निर्बाध चलती रहती है,और आये दिन भारी वाहन दुर्घटना का कारण बनते हैं,और दिन में जब शहर की सडकें व्यस्त रहती हैं,तब वाहनों का आवागमन यातायात के नियमो से शायद बंद रहना चाहिए,लेकिन पुलिसकर्मी के मौजूद रहने के बावजूद भारी वाहन कैसे दिन भर शहर की सड़कों पे दौड़ते रहते हैं,ये तो सोच के परे नहीं है.
कभी अचानक अधिकारीयों का मन होता है तो सड़क के किनारे की सारी अवैध दुकानें उजाड़ दी जाती हैं,लेकिन सिर्फ कुछ ही दिनों बाद वे सभी अपनी जगह पे पुनर्स्थापित हो जाते हैं.ये भी सड़क जाम का एक बड़ा कारण है.
अच्छा होता यदि बार बार उजाड़ने की बजाय इस मामले का एक बार समाधान हो जाता.
खैर जब किसी बड़े नेता का आगमन होता है तो पुलिस हमेशा मुस्तैद नजर आती है ,और कहीं किसी तरह का जाम नही होता.
काश ये नेता रोज आते,कम से कम जाम तो नहीं लगता.
खैर जब राजधानी में ये समस्या दूर नही हो पाती तो हमारे यहाँ तो सोचना ही बेकार है.
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