पिछले हफ्ते एक हिंदी फिल्म देखी ...वाई.एम्.आई.(ये मेरा इंडिया)
बेहतरीन लगी..वास्तव में हम जो सिनेमाघरों में देखते हैं उसकी सीख को वही सीट पे छोड़ कर चले आते हैं...और बुराइयों को गले लगते हुए अपने जेहन में छिपाकर घर लाते हैं......
अगर समाज की बुराइयां सिनेमा से कुछ हद तक प्रेरित हो सकती हैं तो हम अच्छाइयों को गले क्यूँ नही लगाते?
हम क्यूँ कागज़ पर ही सिद्धांत बनाते हैं और जीवन भर एक सुखद संसार की कल्पना करते करते मर जाते हैं?
क्यूँ नही हम बड़े सपने देखने की जगह छोटे छोटे टुकड़े जोड़ते हैं,जो बिखरे पड़े हैं हर जगह,पर सर हमेशा ऊंचा रखने वाले उधर देखते भी नही?
देखो,वरना जिंदगी कांटे निकालने में ही गुजर जायेगी...
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