कभी कभी मैं सोचता हूँ
कि मैं सोचता क्यूँ हूँ?
मेरी सोच भौतिक नही है
शाश्वत है...हमेशा की तरह
क्या इसे कभी कोई रूप मिलेगा?
पता नही
अभी तलक तो गुमनाम ही है.
तो अंजाम क्या हो?
वही जो हमेशा से है...
सोचते रहो...
सोचना ही है तो जुलूस बनाओ
माइक लगाकर सोचो,
ताकि बहरे भी सुन सके.
ऐसा कैमरा लगाओ
जो अंधे भी देख सके.
न समझ में आये तो ऊँची बात हो गयी.
पर इतने ताम झाम वाली सोच ही सोच होती है.
तुम्हारी सोच किसी को नही दिखती.
क्या फर्क पड़ता है.
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