पिछले हफ्ते एक हिंदी फिल्म देखी ...वाई.एम्.आई.(ये मेरा इंडिया)
बेहतरीन लगी..वास्तव में हम जो सिनेमाघरों में देखते हैं उसकी सीख को वही सीट पे छोड़ कर चले आते हैं...और बुराइयों को गले लगते हुए अपने जेहन में छिपाकर घर लाते हैं......
अगर समाज की बुराइयां सिनेमा से कुछ हद तक प्रेरित हो सकती हैं तो हम अच्छाइयों को गले क्यूँ नही लगाते?
हम क्यूँ कागज़ पर ही सिद्धांत बनाते हैं और जीवन भर एक सुखद संसार की कल्पना करते करते मर जाते हैं?
क्यूँ नही हम बड़े सपने देखने की जगह छोटे छोटे टुकड़े जोड़ते हैं,जो बिखरे पड़े हैं हर जगह,पर सर हमेशा ऊंचा रखने वाले उधर देखते भी नही?
देखो,वरना जिंदगी कांटे निकालने में ही गुजर जायेगी...
Monday, November 2, 2009
Friday, October 30, 2009
सोचो तो
कभी कभी मैं सोचता हूँ
कि मैं सोचता क्यूँ हूँ?
मेरी सोच भौतिक नही है
शाश्वत है...हमेशा की तरह
क्या इसे कभी कोई रूप मिलेगा?
पता नही
अभी तलक तो गुमनाम ही है.
तो अंजाम क्या हो?
वही जो हमेशा से है...
सोचते रहो...
सोचना ही है तो जुलूस बनाओ
माइक लगाकर सोचो,
ताकि बहरे भी सुन सके.
ऐसा कैमरा लगाओ
जो अंधे भी देख सके.
न समझ में आये तो ऊँची बात हो गयी.
पर इतने ताम झाम वाली सोच ही सोच होती है.
तुम्हारी सोच किसी को नही दिखती.
क्या फर्क पड़ता है.
कि मैं सोचता क्यूँ हूँ?
मेरी सोच भौतिक नही है
शाश्वत है...हमेशा की तरह
क्या इसे कभी कोई रूप मिलेगा?
पता नही
अभी तलक तो गुमनाम ही है.
तो अंजाम क्या हो?
वही जो हमेशा से है...
सोचते रहो...
सोचना ही है तो जुलूस बनाओ
माइक लगाकर सोचो,
ताकि बहरे भी सुन सके.
ऐसा कैमरा लगाओ
जो अंधे भी देख सके.
न समझ में आये तो ऊँची बात हो गयी.
पर इतने ताम झाम वाली सोच ही सोच होती है.
तुम्हारी सोच किसी को नही दिखती.
क्या फर्क पड़ता है.
Friday, October 23, 2009
ग़रीब के घर दिवाली कब आएगी?
जब ग़रीब को दो वक़्त की रोटी ,
चैन से मिल जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दिवाली आएगी।
जब उसके बच्चों के चेहरे पर ,
ख़ुशियों की मुस्कान आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब को रोटी , कपड़ा और मकान जैसी सुविधाएं
आराम से मिल जाएंगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर लालटेन की जगह ,
बिजली की लाइट जलाई जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब की चादर ,
उसके तन को पूरा ढक पाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर में भी ,
खुशियों की बहार आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
I liked this original work by Gaurav Kumar Tak,Gwaliar
Hope you'll like it too.
his e-mail address is given underneath.
संपर्क: gauravtakswm@gmail.com
चैन से मिल जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दिवाली आएगी।
जब उसके बच्चों के चेहरे पर ,
ख़ुशियों की मुस्कान आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब को रोटी , कपड़ा और मकान जैसी सुविधाएं
आराम से मिल जाएंगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर लालटेन की जगह ,
बिजली की लाइट जलाई जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब की चादर ,
उसके तन को पूरा ढक पाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर में भी ,
खुशियों की बहार आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
I liked this original work by Gaurav Kumar Tak,Gwaliar
Hope you'll like it too.
his e-mail address is given underneath.
संपर्क: gauravtakswm@gmail.com
Monday, May 18, 2009
now people have the taste,and they can easily express their choices.
If you provide them a pint of beer,they are crazy about that and if it is a glass of fresh milk,many will love it,but when you pour wine in milk labelled bottle or milk in the bottle of wine,no one is going to appreciate.
the same thing happened from my constituency,Mr.Prakash Jha is a good person but he lost the elections.
I am sad at the mandate in favour of Gandhis,but am happy at the fall of 'JUNGLE RAAJ'in bihar.
Now,I think it is better for me to stay aloof from these political policies,because I am,for sure,not going to seek a career in that.
If you provide them a pint of beer,they are crazy about that and if it is a glass of fresh milk,many will love it,but when you pour wine in milk labelled bottle or milk in the bottle of wine,no one is going to appreciate.
the same thing happened from my constituency,Mr.Prakash Jha is a good person but he lost the elections.
I am sad at the mandate in favour of Gandhis,but am happy at the fall of 'JUNGLE RAAJ'in bihar.
Now,I think it is better for me to stay aloof from these political policies,because I am,for sure,not going to seek a career in that.