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Monday, March 8, 2010

लौट चलो.......

पैसे में बड़ी ताकत होती है.......अब तक मैं यही सोचता था कि कुछ इस दुनिया में ऐसा जरूर है,जिन्हें पैसे से नही खरीदा जा सकता ,जैसे भगवान्,भावनाएं,भाईचारा इत्यादि......लेकिन मैं जो कुछ देखता और सोचता हूँ तो यही पाता हूँ कि धीरे धीरे बिकाउपन में इजाफा ही होता जा रहा है...
जो मंदिर जितना ही भव्य है उसकी महिमा उतनी ही बड़ी होती है.....
धनवान बोले तो तुरंत गहरा असर होता है,गरीब जिंदगी भर चीखता चिल्लाता मर जाता है.
कभी एक ऐसा भी दौर था जब हमारे देश के लोगों को सीख भी दी जाती थी कि हॉकी के मैदान में जितना पसीना बहाओगे,युद्ध के मैदान में उतना कम खून बहेगा.
रग रग में,हमारी धडकनों में,सोच में बसी हुयी थी हॉकी......हमने हॉकी में दुनिया को झुकाया,खेलों के सबसे बड़े महाकुम्भ में राष्ट्र का सीना गर्व से चौड़ा किया,और इतनी बार किया जितना किसी देश ने आज तक नही किया, जो जो बन सका सब किया.लेकिन हमने बदले में क्या किया?
हमारे दिल में हॉकी की धडकनें जब बिक गयी,क्रिकेट के खेल में जैसे-जैसे ताबड़तोड़ पैसा आना शुरू हुआ,बस भावनाएं भी बिकने लगी.
आज हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,जितना तालियाँ एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी को विश्व कप के मैच में गोल करने पर मिल रही थी,उससे ज्यादा तालियाँ शायद बिकाऊ आई पी एल के पूर्णतया व्यवसायिक मैच में एक चौका लगने पर बजती हैं.
आज समस्या यह है कि लोग आखिर क्यूँ हॉकी देखना नही चाहते,खिलाड़ी भी हॉकी को अपना करियर बनाने से कतराने लगे हैं....
क्यूंकि हम लगातार हॉकी में हार रहे हैं????
मैं नही मानता,क्रिकेट विश्व कप २००७ में हम पहले दौर में बाहर हो गए तो क्या उसकी लोकप्रियता कम हुयी???१९७५ और १९७९ के विश्वकप में भी हमने कोई तीर नही मारा था...और उस दौरान हमारी हॉकी टीम वाकई बहुत अच्छा खेली थी,लेकिन उस वक़्त भी क्रिकेट टीम के हर सदस्य का नाम लोगों की जुबान पर था,और हॉकी टीम के खिलाडियों के चेहरे अब कम लोगों को ही याद होंगे......और हॉकी खिलाडियों का किया धरा भी लोग जल्दी ही भुला देते हैं.
आधुनिक युग है,जहां पैसा है,वहाँ आकर्षण है....चरित्रहीन सुन्दर चंचला भी चित्त का आकर्षण करने में कोई कमी नही छोडती.
एक खेल है,जहां मेहनत कम और शोहरत ज्यादा है,उलटे एक राष्ट्रीय खेल है जिसमे ज्यादा मेहनत और अच्छी किस्मत भी जरूरी होती है,और शोहरत तो खैर ध्यानचंद की भी क्रिकेट के चमकते चेहरों के सामने मद्धिम की जाने लगती है.
आज के समय में लोग अपना करियर बनाने के लिए,पैसा कमाने के लिए क्रिकेट खेलने लगे हैं,और क्रिकेट खिलाड़ी मजे में जिंदगी गुजार रहे हैं.
और हॉकी खिलाड़ी अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर देश का सर ऊँचा रखने का अथक प्रयास कर रहे हैं,लेकिन हम शायद ऐसा होने देने की राह में सबसे बड़ी बाधा खड़ी कर रहे हैं.
हाँ,सच में हम हैं परेशानी,क्रिकेट में बहुत पैसा है,उसने हमारी भावनाएं भी खरीद ली,जहां पैसा है वहाँ आकर्षण है,क्रिकेट में भी पैसे सिर्फ रन बनाने से नही आते,पैसे तो हमारी वजह से आते हैं,क्यूंकि हम पागल हैं इस खेल के पीछे,हम देखते हैं,इसीलिए क्रिकेट बिकता है,हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,इसीलिए क्रिकेट बिकता है..
और क्रिकेट बिकता है इसीलिए अपनी हर तरह की सीमित विशेषताओं के बावजूद हमारे दिल और दिमाग पर इस कदर छा चुका है की हम कभी ऐसा सोच ही नही पाते की महान खिलाड़ियों पेले, ब्रैडमैन की तरह एक निर्विवाद अतुलनीय खिलाड़ी ध्यानचंद भी कभी हमारी राष्ट्रीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे थे......और अद्वितीय गर्व एवं पराक्रम से ओत-प्रोत जितने अवसर हमें इस खेल ने दिए हैं,उनका उपकार हमने यूँ ना भुला दिया होता.खेलों की दुनिया में भारत का रत्न कहलाने का पहला हक़ अगर किसी का है तो वो सिर्फ और सिर्फ ध्यानचंद हैं,वरना शौर्य शोहरत के आगे घुटने टेक कर बेबसी का रोना रोता रहेगा,जो आज के युग में संभव होता दिख रहा है.
आज भी जो ख़ुशी हमारी हॉकी टीम अगले ओलम्पिक में स्वर्ण पदक लेकर दे सकती है,क्या क्रिकेट का कोई लम्हा हमें इतना खुशनसीब महसूस करने का मौका दे सकता है?
हम बाजार हैं,हम हैं वो लोग जिन्होंने पैसे की चमक देख कर जबरन अपना मुख हॉकी से मोड़ लिया....
आज हमारा राष्ट्रीय खेल तड़प रहा है.....जमाना बदल गया है पैसे के आगे हर चीज बिकती जा रही है,फिर हम हॉकी में जीत क्यूँ नही खरीद सकते?
देखो क्रिकेट में भी पैसा पूरा फूँक दिया तभी तो,लगातार क्रिकेट का जूनून बढ़ा,खिलाड़ी खेलने के लिए आगे आये,और करियर की चिंता छोड़ कर क्रिकेट को सारा समर्पण दिया और नंबर एक तक पहुंचे.
ऐसा ही हॉकी से साथ भी करने की जरुरत है.
तो हम जहां जायेंगे,लोग हमें खरीदने की कोशिश करेंगे,कितना अच्छा होता यदि हम सब अपनी बिकी हुयी भावनाओं को फिर बिकने का मौका दें,और इस बार उसका साथ दें जो हमारे समर्थन के अभाव में सिसक रहा है......घबराइए नही.....हमें किसी कांट्रेक्ट के जरिये नही खरीदा गया जो क्रिकेट वाले रविन्द्र जडेजा की तरह हम पर किसी तरह का कोई प्रतिबन्ध लगा सकें.
हम अपनी स्वेच्छा से जिसे चाहे अपनाएं...लेकिन वो लम्हा महसूस करने की ख्वाहिश रखना और ना रखना ही सबसे अहम् है.
हम जुड़ेंगे तभी हमें सीने को उसी गर्व के साथ चौड़ा करने का मौका मिलेगा जो हमारी पिछली पीढ़ी ने हर उस बार महसूस किया,जब जब हॉकी टीम ने अपनी चमक बिखेरी..
मैं उस लम्हे को तहे दिल से महसूस करना चाहता हूँ,उस भेड़चाल से मन उब गया है,जहां हर ताली पे सर ऊँचा होता है....और अगले दिन सर छुपाने से भी नही छुप सकता....
हमारा राष्ट्रीय खेल शर्मिंदा हैं,क्यूंकि हम उसे सर उठाने नही देते......मौका दीजिये ताकि....ध्यानचंद को ऐसा ना महसूस हो कि उनके देशवासियों ने उनके साथ इतनी बड़ी गद्दारी की और उन्हें हिटलर का प्रस्ताव अस्वीकार करना अपनी मूर्खता ना लगने लगे.
अतः कृपया कर हॉकी को वो सब कुछ देने की कोशिश कीजिये जो आप क्रिकेट को देना चाहते हैं या देते हैं...आप की जेबों पे कोई फर्क नही पड़ेगा,लेकिन दूसरो की जेब जो क्रिकेट पे ढीली होती रही है....शायद हॉकी पे ही रहम खाए और,और जब हम सब साथ होंगे तो क्यूँ नही फिर बरसेगी खुशियों की सौगात.
और सोचिये महसूस कीजिये उस लम्हे को जब हमारे खिलाड़ी सोने का तमगा लगाये दुनिया के सबसे बड़े खेल महाकुम्भ में पूरी दुनिया के सामने सीना ताने खड़े होंगे और बैकग्राउंड में शान के साथ बजता रहेगा.......'जन गन मन अधिनायक..............'
क्या आपको ये मंजर अच्छा नही लगेगा?
तो फिर क्या सोच रहे हैं,हर किसी को उसका उचित स्थान देना चाहिए तो हम हॉकी को क्यूँ दिल से निकाले हुए हैं,चलिए वापस अपने घर चलें.
क्रिकेट का अपना अलग रोमांच है,लेकिन हमें हॉकी के साथ ये बदसलूकी नही करना चाहिए.
आइये......अपने खिलाड़ियों को भी महान कहलाने का मौका दें.....और देश का सर सम्मान से ऊपर उठाने का मौका दें.
हॉकी को अपने दिल में वही जगह दें,जो उसे मिलनी चाहिए.

5 comments:

Anonymous said...

i m agree


Abhinav

Anonymous said...

u r ryt..........
Hockey really needs our real n strong support

Shweta Sinha

Masroor (Rehan) said...

Really
Hockey is in need of our support to make proud INDIA....
Jai Hockey Jai Hind........

Rahul Priyadarshi 'MISHRA' said...

Thanks friends...
I will be happier if it continues

honesty project democracy said...

जब साडी सामाजिक और सरकारी व्यवस्था सड़ जाती है ,तो बिकाऊपन को बढ़ाबा मिलता है / लेकिन मेरी सलाह है की बिककर झूठ और साजिश का हिस्सा बनकर जीने से अच्छा है ,एक नेक काम और सच्चाई के लिए अपना जान दे देना /

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