क्रिकेट गेंद और बल्ले का खेल है......क्या सच में तेज खेलने वाले खिलाड़ी ज्यादा स्तरीय होते हैं?
एक प्रदर्शन बंगलादेश के खिलाड़ियों ने किया,भले ही यह एक प्रथम श्रेणी का मुकाबला था,अंतर्राष्ट्रीय नही,लेकिन इन बल्लेबाजों की तारीफ जरूर होनी चाहिए...क्यूंकि सामने वाली टीम इंग्लैंड की राष्ट्रीय खेल की टीम थी.
देखें स्कोरकार्ड .......
सलाम डॉलर महमूद और शुवागोतो होम
Wednesday, March 10, 2010
Monday, March 8, 2010
लौट चलो.......
पैसे में बड़ी ताकत होती है.......अब तक मैं यही सोचता था कि कुछ इस दुनिया में ऐसा जरूर है,जिन्हें पैसे से नही खरीदा जा सकता ,जैसे भगवान्,भावनाएं,भाईचारा इत्यादि......लेकिन मैं जो कुछ देखता और सोचता हूँ तो यही पाता हूँ कि धीरे धीरे बिकाउपन में इजाफा ही होता जा रहा है...
जो मंदिर जितना ही भव्य है उसकी महिमा उतनी ही बड़ी होती है.....
धनवान बोले तो तुरंत गहरा असर होता है,गरीब जिंदगी भर चीखता चिल्लाता मर जाता है.
कभी एक ऐसा भी दौर था जब हमारे देश के लोगों को सीख भी दी जाती थी कि हॉकी के मैदान में जितना पसीना बहाओगे,युद्ध के मैदान में उतना कम खून बहेगा.
रग रग में,हमारी धडकनों में,सोच में बसी हुयी थी हॉकी......हमने हॉकी में दुनिया को झुकाया,खेलों के सबसे बड़े महाकुम्भ में राष्ट्र का सीना गर्व से चौड़ा किया,और इतनी बार किया जितना किसी देश ने आज तक नही किया, जो जो बन सका सब किया.लेकिन हमने बदले में क्या किया?
हमारे दिल में हॉकी की धडकनें जब बिक गयी,क्रिकेट के खेल में जैसे-जैसे ताबड़तोड़ पैसा आना शुरू हुआ,बस भावनाएं भी बिकने लगी.
आज हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,जितना तालियाँ एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी को विश्व कप के मैच में गोल करने पर मिल रही थी,उससे ज्यादा तालियाँ शायद बिकाऊ आई पी एल के पूर्णतया व्यवसायिक मैच में एक चौका लगने पर बजती हैं.
आज समस्या यह है कि लोग आखिर क्यूँ हॉकी देखना नही चाहते,खिलाड़ी भी हॉकी को अपना करियर बनाने से कतराने लगे हैं....
क्यूंकि हम लगातार हॉकी में हार रहे हैं????
मैं नही मानता,क्रिकेट विश्व कप २००७ में हम पहले दौर में बाहर हो गए तो क्या उसकी लोकप्रियता कम हुयी???१९७५ और १९७९ के विश्वकप में भी हमने कोई तीर नही मारा था...और उस दौरान हमारी हॉकी टीम वाकई बहुत अच्छा खेली थी,लेकिन उस वक़्त भी क्रिकेट टीम के हर सदस्य का नाम लोगों की जुबान पर था,और हॉकी टीम के खिलाडियों के चेहरे अब कम लोगों को ही याद होंगे......और हॉकी खिलाडियों का किया धरा भी लोग जल्दी ही भुला देते हैं.
आधुनिक युग है,जहां पैसा है,वहाँ आकर्षण है....चरित्रहीन सुन्दर चंचला भी चित्त का आकर्षण करने में कोई कमी नही छोडती.
एक खेल है,जहां मेहनत कम और शोहरत ज्यादा है,उलटे एक राष्ट्रीय खेल है जिसमे ज्यादा मेहनत और अच्छी किस्मत भी जरूरी होती है,और शोहरत तो खैर ध्यानचंद की भी क्रिकेट के चमकते चेहरों के सामने मद्धिम की जाने लगती है.
आज के समय में लोग अपना करियर बनाने के लिए,पैसा कमाने के लिए क्रिकेट खेलने लगे हैं,और क्रिकेट खिलाड़ी मजे में जिंदगी गुजार रहे हैं.
और हॉकी खिलाड़ी अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर देश का सर ऊँचा रखने का अथक प्रयास कर रहे हैं,लेकिन हम शायद ऐसा होने देने की राह में सबसे बड़ी बाधा खड़ी कर रहे हैं.
हाँ,सच में हम हैं परेशानी,क्रिकेट में बहुत पैसा है,उसने हमारी भावनाएं भी खरीद ली,जहां पैसा है वहाँ आकर्षण है,क्रिकेट में भी पैसे सिर्फ रन बनाने से नही आते,पैसे तो हमारी वजह से आते हैं,क्यूंकि हम पागल हैं इस खेल के पीछे,हम देखते हैं,इसीलिए क्रिकेट बिकता है,हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,इसीलिए क्रिकेट बिकता है..
और क्रिकेट बिकता है इसीलिए अपनी हर तरह की सीमित विशेषताओं के बावजूद हमारे दिल और दिमाग पर इस कदर छा चुका है की हम कभी ऐसा सोच ही नही पाते की महान खिलाड़ियों पेले, ब्रैडमैन की तरह एक निर्विवाद अतुलनीय खिलाड़ी ध्यानचंद भी कभी हमारी राष्ट्रीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे थे......और अद्वितीय गर्व एवं पराक्रम से ओत-प्रोत जितने अवसर हमें इस खेल ने दिए हैं,उनका उपकार हमने यूँ ना भुला दिया होता.खेलों की दुनिया में भारत का रत्न कहलाने का पहला हक़ अगर किसी का है तो वो सिर्फ और सिर्फ ध्यानचंद हैं,वरना शौर्य शोहरत के आगे घुटने टेक कर बेबसी का रोना रोता रहेगा,जो आज के युग में संभव होता दिख रहा है.
आज भी जो ख़ुशी हमारी हॉकी टीम अगले ओलम्पिक में स्वर्ण पदक लेकर दे सकती है,क्या क्रिकेट का कोई लम्हा हमें इतना खुशनसीब महसूस करने का मौका दे सकता है?
हम बाजार हैं,हम हैं वो लोग जिन्होंने पैसे की चमक देख कर जबरन अपना मुख हॉकी से मोड़ लिया....
आज हमारा राष्ट्रीय खेल तड़प रहा है.....जमाना बदल गया है पैसे के आगे हर चीज बिकती जा रही है,फिर हम हॉकी में जीत क्यूँ नही खरीद सकते?
देखो क्रिकेट में भी पैसा पूरा फूँक दिया तभी तो,लगातार क्रिकेट का जूनून बढ़ा,खिलाड़ी खेलने के लिए आगे आये,और करियर की चिंता छोड़ कर क्रिकेट को सारा समर्पण दिया और नंबर एक तक पहुंचे.
ऐसा ही हॉकी से साथ भी करने की जरुरत है.
तो हम जहां जायेंगे,लोग हमें खरीदने की कोशिश करेंगे,कितना अच्छा होता यदि हम सब अपनी बिकी हुयी भावनाओं को फिर बिकने का मौका दें,और इस बार उसका साथ दें जो हमारे समर्थन के अभाव में सिसक रहा है......घबराइए नही.....हमें किसी कांट्रेक्ट के जरिये नही खरीदा गया जो क्रिकेट वाले रविन्द्र जडेजा की तरह हम पर किसी तरह का कोई प्रतिबन्ध लगा सकें.
हम अपनी स्वेच्छा से जिसे चाहे अपनाएं...लेकिन वो लम्हा महसूस करने की ख्वाहिश रखना और ना रखना ही सबसे अहम् है.
हम जुड़ेंगे तभी हमें सीने को उसी गर्व के साथ चौड़ा करने का मौका मिलेगा जो हमारी पिछली पीढ़ी ने हर उस बार महसूस किया,जब जब हॉकी टीम ने अपनी चमक बिखेरी..
मैं उस लम्हे को तहे दिल से महसूस करना चाहता हूँ,उस भेड़चाल से मन उब गया है,जहां हर ताली पे सर ऊँचा होता है....और अगले दिन सर छुपाने से भी नही छुप सकता....
हमारा राष्ट्रीय खेल शर्मिंदा हैं,क्यूंकि हम उसे सर उठाने नही देते......मौका दीजिये ताकि....ध्यानचंद को ऐसा ना महसूस हो कि उनके देशवासियों ने उनके साथ इतनी बड़ी गद्दारी की और उन्हें हिटलर का प्रस्ताव अस्वीकार करना अपनी मूर्खता ना लगने लगे.
अतः कृपया कर हॉकी को वो सब कुछ देने की कोशिश कीजिये जो आप क्रिकेट को देना चाहते हैं या देते हैं...आप की जेबों पे कोई फर्क नही पड़ेगा,लेकिन दूसरो की जेब जो क्रिकेट पे ढीली होती रही है....शायद हॉकी पे ही रहम खाए और,और जब हम सब साथ होंगे तो क्यूँ नही फिर बरसेगी खुशियों की सौगात.
और सोचिये महसूस कीजिये उस लम्हे को जब हमारे खिलाड़ी सोने का तमगा लगाये दुनिया के सबसे बड़े खेल महाकुम्भ में पूरी दुनिया के सामने सीना ताने खड़े होंगे और बैकग्राउंड में शान के साथ बजता रहेगा.......'जन गन मन अधिनायक..............'
क्या आपको ये मंजर अच्छा नही लगेगा?
तो फिर क्या सोच रहे हैं,हर किसी को उसका उचित स्थान देना चाहिए तो हम हॉकी को क्यूँ दिल से निकाले हुए हैं,चलिए वापस अपने घर चलें.
क्रिकेट का अपना अलग रोमांच है,लेकिन हमें हॉकी के साथ ये बदसलूकी नही करना चाहिए.
आइये......अपने खिलाड़ियों को भी महान कहलाने का मौका दें.....और देश का सर सम्मान से ऊपर उठाने का मौका दें.
हॉकी को अपने दिल में वही जगह दें,जो उसे मिलनी चाहिए.
जो मंदिर जितना ही भव्य है उसकी महिमा उतनी ही बड़ी होती है.....
धनवान बोले तो तुरंत गहरा असर होता है,गरीब जिंदगी भर चीखता चिल्लाता मर जाता है.
कभी एक ऐसा भी दौर था जब हमारे देश के लोगों को सीख भी दी जाती थी कि हॉकी के मैदान में जितना पसीना बहाओगे,युद्ध के मैदान में उतना कम खून बहेगा.
रग रग में,हमारी धडकनों में,सोच में बसी हुयी थी हॉकी......हमने हॉकी में दुनिया को झुकाया,खेलों के सबसे बड़े महाकुम्भ में राष्ट्र का सीना गर्व से चौड़ा किया,और इतनी बार किया जितना किसी देश ने आज तक नही किया, जो जो बन सका सब किया.लेकिन हमने बदले में क्या किया?
हमारे दिल में हॉकी की धडकनें जब बिक गयी,क्रिकेट के खेल में जैसे-जैसे ताबड़तोड़ पैसा आना शुरू हुआ,बस भावनाएं भी बिकने लगी.
आज हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,जितना तालियाँ एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी को विश्व कप के मैच में गोल करने पर मिल रही थी,उससे ज्यादा तालियाँ शायद बिकाऊ आई पी एल के पूर्णतया व्यवसायिक मैच में एक चौका लगने पर बजती हैं.
आज समस्या यह है कि लोग आखिर क्यूँ हॉकी देखना नही चाहते,खिलाड़ी भी हॉकी को अपना करियर बनाने से कतराने लगे हैं....
क्यूंकि हम लगातार हॉकी में हार रहे हैं????
मैं नही मानता,क्रिकेट विश्व कप २००७ में हम पहले दौर में बाहर हो गए तो क्या उसकी लोकप्रियता कम हुयी???१९७५ और १९७९ के विश्वकप में भी हमने कोई तीर नही मारा था...और उस दौरान हमारी हॉकी टीम वाकई बहुत अच्छा खेली थी,लेकिन उस वक़्त भी क्रिकेट टीम के हर सदस्य का नाम लोगों की जुबान पर था,और हॉकी टीम के खिलाडियों के चेहरे अब कम लोगों को ही याद होंगे......और हॉकी खिलाडियों का किया धरा भी लोग जल्दी ही भुला देते हैं.
आधुनिक युग है,जहां पैसा है,वहाँ आकर्षण है....चरित्रहीन सुन्दर चंचला भी चित्त का आकर्षण करने में कोई कमी नही छोडती.
एक खेल है,जहां मेहनत कम और शोहरत ज्यादा है,उलटे एक राष्ट्रीय खेल है जिसमे ज्यादा मेहनत और अच्छी किस्मत भी जरूरी होती है,और शोहरत तो खैर ध्यानचंद की भी क्रिकेट के चमकते चेहरों के सामने मद्धिम की जाने लगती है.
आज के समय में लोग अपना करियर बनाने के लिए,पैसा कमाने के लिए क्रिकेट खेलने लगे हैं,और क्रिकेट खिलाड़ी मजे में जिंदगी गुजार रहे हैं.
और हॉकी खिलाड़ी अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर देश का सर ऊँचा रखने का अथक प्रयास कर रहे हैं,लेकिन हम शायद ऐसा होने देने की राह में सबसे बड़ी बाधा खड़ी कर रहे हैं.
हाँ,सच में हम हैं परेशानी,क्रिकेट में बहुत पैसा है,उसने हमारी भावनाएं भी खरीद ली,जहां पैसा है वहाँ आकर्षण है,क्रिकेट में भी पैसे सिर्फ रन बनाने से नही आते,पैसे तो हमारी वजह से आते हैं,क्यूंकि हम पागल हैं इस खेल के पीछे,हम देखते हैं,इसीलिए क्रिकेट बिकता है,हमारा दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है,इसीलिए क्रिकेट बिकता है..
और क्रिकेट बिकता है इसीलिए अपनी हर तरह की सीमित विशेषताओं के बावजूद हमारे दिल और दिमाग पर इस कदर छा चुका है की हम कभी ऐसा सोच ही नही पाते की महान खिलाड़ियों पेले, ब्रैडमैन की तरह एक निर्विवाद अतुलनीय खिलाड़ी ध्यानचंद भी कभी हमारी राष्ट्रीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे थे......और अद्वितीय गर्व एवं पराक्रम से ओत-प्रोत जितने अवसर हमें इस खेल ने दिए हैं,उनका उपकार हमने यूँ ना भुला दिया होता.खेलों की दुनिया में भारत का रत्न कहलाने का पहला हक़ अगर किसी का है तो वो सिर्फ और सिर्फ ध्यानचंद हैं,वरना शौर्य शोहरत के आगे घुटने टेक कर बेबसी का रोना रोता रहेगा,जो आज के युग में संभव होता दिख रहा है.
आज भी जो ख़ुशी हमारी हॉकी टीम अगले ओलम्पिक में स्वर्ण पदक लेकर दे सकती है,क्या क्रिकेट का कोई लम्हा हमें इतना खुशनसीब महसूस करने का मौका दे सकता है?
हम बाजार हैं,हम हैं वो लोग जिन्होंने पैसे की चमक देख कर जबरन अपना मुख हॉकी से मोड़ लिया....
आज हमारा राष्ट्रीय खेल तड़प रहा है.....जमाना बदल गया है पैसे के आगे हर चीज बिकती जा रही है,फिर हम हॉकी में जीत क्यूँ नही खरीद सकते?
देखो क्रिकेट में भी पैसा पूरा फूँक दिया तभी तो,लगातार क्रिकेट का जूनून बढ़ा,खिलाड़ी खेलने के लिए आगे आये,और करियर की चिंता छोड़ कर क्रिकेट को सारा समर्पण दिया और नंबर एक तक पहुंचे.
ऐसा ही हॉकी से साथ भी करने की जरुरत है.
तो हम जहां जायेंगे,लोग हमें खरीदने की कोशिश करेंगे,कितना अच्छा होता यदि हम सब अपनी बिकी हुयी भावनाओं को फिर बिकने का मौका दें,और इस बार उसका साथ दें जो हमारे समर्थन के अभाव में सिसक रहा है......घबराइए नही.....हमें किसी कांट्रेक्ट के जरिये नही खरीदा गया जो क्रिकेट वाले रविन्द्र जडेजा की तरह हम पर किसी तरह का कोई प्रतिबन्ध लगा सकें.
हम अपनी स्वेच्छा से जिसे चाहे अपनाएं...लेकिन वो लम्हा महसूस करने की ख्वाहिश रखना और ना रखना ही सबसे अहम् है.
हम जुड़ेंगे तभी हमें सीने को उसी गर्व के साथ चौड़ा करने का मौका मिलेगा जो हमारी पिछली पीढ़ी ने हर उस बार महसूस किया,जब जब हॉकी टीम ने अपनी चमक बिखेरी..
मैं उस लम्हे को तहे दिल से महसूस करना चाहता हूँ,उस भेड़चाल से मन उब गया है,जहां हर ताली पे सर ऊँचा होता है....और अगले दिन सर छुपाने से भी नही छुप सकता....
हमारा राष्ट्रीय खेल शर्मिंदा हैं,क्यूंकि हम उसे सर उठाने नही देते......मौका दीजिये ताकि....ध्यानचंद को ऐसा ना महसूस हो कि उनके देशवासियों ने उनके साथ इतनी बड़ी गद्दारी की और उन्हें हिटलर का प्रस्ताव अस्वीकार करना अपनी मूर्खता ना लगने लगे.
अतः कृपया कर हॉकी को वो सब कुछ देने की कोशिश कीजिये जो आप क्रिकेट को देना चाहते हैं या देते हैं...आप की जेबों पे कोई फर्क नही पड़ेगा,लेकिन दूसरो की जेब जो क्रिकेट पे ढीली होती रही है....शायद हॉकी पे ही रहम खाए और,और जब हम सब साथ होंगे तो क्यूँ नही फिर बरसेगी खुशियों की सौगात.
और सोचिये महसूस कीजिये उस लम्हे को जब हमारे खिलाड़ी सोने का तमगा लगाये दुनिया के सबसे बड़े खेल महाकुम्भ में पूरी दुनिया के सामने सीना ताने खड़े होंगे और बैकग्राउंड में शान के साथ बजता रहेगा.......'जन गन मन अधिनायक..............'
क्या आपको ये मंजर अच्छा नही लगेगा?
तो फिर क्या सोच रहे हैं,हर किसी को उसका उचित स्थान देना चाहिए तो हम हॉकी को क्यूँ दिल से निकाले हुए हैं,चलिए वापस अपने घर चलें.
क्रिकेट का अपना अलग रोमांच है,लेकिन हमें हॉकी के साथ ये बदसलूकी नही करना चाहिए.
आइये......अपने खिलाड़ियों को भी महान कहलाने का मौका दें.....और देश का सर सम्मान से ऊपर उठाने का मौका दें.
हॉकी को अपने दिल में वही जगह दें,जो उसे मिलनी चाहिए.
Tuesday, March 2, 2010
क्या आपको पता है.....राहुल द्रविड़ एकमात्र ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले सभी देशों के खिलाफ कम से कम १० कैच लिया है.
शाबाश सचिन
सलाम सचिन,दोहरा शतक जमाकर तुमने अपनी ऊँचाई और बढ़ा ली,देश का नाम भी गौरव से ऊपर बढाया.
मेरी तरफ से भी बहुत सारी बधाई तुम्हें,तुमने खेल जगत में हमारा नाम ऊँचा किया,अब तो क्रिकेट ओलम्पिक में भी शामिल हो जाएगा,अल्लाह से दुआ करता हूँ कि तुम तब तक खेलो ताकि हमारा दांव भारी पड़े पदक जीतने के मामले में.आम आदमी की पहुँच से दूर,महामानवीय प्रदर्शन जैसा तुम कर रहे हो करते रहो,ये ख्वाहिश है हमारी,अगर उम्र ना पड़े तुम पर भारी.
तुम बहुत बड़े खिलाड़ी हो,और मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ.
मैं चाहता हूँ कि तुम्हें भारत रत्न मिले,बेशक मिले ,लेकिन साथ ही साथ मैं ये चाहता हूँ कि तुम वैसा ही करो(देखें),जैसा अबुल कलाम आजाद ने किया,जैसा हाल में आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री ने किया,और मुझे तुमसे ये उम्मीद है कि तुम एक ऐसा उदाहरण पेश करो,जो ना सिर्फ तुम्हें एक महान खिलाड़ी बल्कि एक महान भारतीय का प्रतीक बना दे.
किसी भी ज्वलंत मुद्दे,गरमाए माहौल को,शोहरत के उफान को,शौर्य के परवान को भुनाने में माहिर कुछ स्वार्थी लोग,यूँ कहे तो राजनेता,आजकल तुम्हें भारत रत्न से नवाजने की मांग कर रहे हैं,क्यूंकि तुम तो भारत के रत्न हो निस्संदेह,लेकिन ये लोग चढ़ते सूरज को दिया दिखाकर मन्नतें पूरी होने का ख्वाब देख रहे हैं.(देखें)
अब सिफारिश कोई भी करे,तुम्हें तो भारत रत्न मिलना ही है.
लेकिन क्या तुम्हें खुद नही लगता कि अभी तुम्हें ये पुरस्कार नही मिलना चाहिए,इसलिए नही कि तुम इसके योग्य नही हो,बल्कि इसलिए कि अभी कुछ भारतीय ऐसे भी हैं,जो तुमसे ज्यादा काबिल हैं/थे,लेकिन उनकी सिफारिश तक करना मतलबियों ने उचित नही समझा,अब कौन डूबती नैया में सवारी करे,और वैसे भी इन लोगों की सिफारिश कितनी पूर्वाग्रह से ग्रसित है,अगर भारत रत्न प्राप्तकर्ताओं की सूची देखो तो शायद कहीं स्पष्ट हो,इन जैसे लोगों ने इंदिरा गांधी को सरदार बल्लभ भाई पटेल,भीमराव अम्बेडकर,मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से पहले भारत रत्न दिला दिया,और तो और सरदार पटेलजी को तो राजीव गाँधी के साथ ही भारत रत्न के लायक समझा गया.
अब क्या ये कुछ अटपटा नही लग रहा है की जिन लोगों ने ध्यानचंद जैसे निर्विवाद रूप से हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी के इतिहास के सर्वकालीन महानतम खिलाड़ी को भी इस पुरस्कार के योग्य नही समझा,वे तुम्हें भारत रत्न दिलाने की मांग कर रहे हैं,क्या तुम्हें ये नही खटकता?
सोचो,ध्यानचंद का जो दबदबा हॉकी के मैदान में था,उसके प्रभुत्व को दूर दूर तक कोई नाम चुनौती दे सके ऐसा नजर नही आता.खुद ब्रैडमैन ने ध्यानचंद जी से कहा था'You score goals like runs in cricket.'
और रही बात तुम्हारी तो ऐसे कई नाम हैं क्रिकेट की दुनिया में,जो शायद तुम्हारे प्रभुत्व को चुनौती दे सके,और कुछ नाम ऐसे भी हैं,जिनके सामने हम रिरियाते हुए तुम्हारे बड़प्पन के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं,जैसे ब्रैडमैन,सोबर्स,बैरी रिचर्ड्स,विव रिचर्ड्स इत्यादि(नाम और भी बहुत हैं,रूचि हो तो पूछ लें).
अब अगर ये लगे कि ये सभी तो विदेशी हैं,क्रिकेट की दुनिया में हिन्दुस्तान के सबसे बड़े खिलाडी हो तुम,लेकिन अगर रिकॉर्ड का आइना अलग रखा जाए तो तुम्हारी श्रेष्ठता हमेशा विवाद का विषय रहेगी,इसमें कोई शक नहीं की तुम महान हो,और दुनिया के सर्वकालिक महान क्रिकेट खिलाड़ियों में से एक हो. लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ भरतीयों को ही इस सम्मान के लायक समझा जाता हो.भारत रत्न ऐसा सम्मान है जिसे हमेशा अपने सर के ऊपर रखा जाता है,और मैं चाहता हूँ कि जब तुम क्रिकेट की दुनिया को एक खिलाड़ी के रूप में अलविदा कहो तो तब तुम्हें ये सम्मान मिले,क्यूंकि मैं नही चाहता कि कभी भी भारत रत्न सर झुकाए,बल्ला घसीटते हुए मैदान से बाहर आये.मान लो कल को तुम क्रिकेट टीम के कोच बन गए,और भगवान् ना करे कभी ये टीम बुरी तरह हार गयी,तो फिर कोई भारत रत्न को बुरा-भला कहे तो कितनी चोट पहुंचेगी दिल को.
अतः हे सचिन,कृपा कर सम्मान की गरिमा को बचाए रखने की पुरजोर कोशिश करो,और ये सिर्फ तुम कर सकते हो.
तुमने अनेकों बार हमारा सर गर्व से ऊँचा उठाया है,लेकिन 'भारत रत्न' बन जाने के बाद अगर एक बार भी तुम्हारा बल्ला झुका तो क्या हम शर्म का अनुभव ना करेंगे?
अतः प्लीज अभी तुम उन लालायित लोगों कों शांत करने का प्रयास करो,और ख़ुशी ख़ुशी संन्यास लो,जब तुम्हारी मर्ज़ी हो.
और तब मैं भी ध्यानचंद के साथ तुम्हें भारत रत्न दिलाने की वकालत अपनी पूरी औकात से करूँगा.
एक बार फिर तुम्हें बधाई और ये शुभकामना कि तुम कभी भी अपना और देश का माथा झुकने ना दो,हमेशा नयी बुलंदी दो.
आमीन.

