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Friday, October 30, 2009

सोचो तो

कभी कभी मैं सोचता हूँ
कि मैं सोचता क्यूँ हूँ?
मेरी सोच भौतिक नही है
शाश्वत है...हमेशा की तरह
क्या इसे कभी कोई रूप मिलेगा?
पता नही
अभी तलक तो गुमनाम ही है.
तो अंजाम क्या हो?
वही जो हमेशा से है...
सोचते रहो...
सोचना ही है तो जुलूस बनाओ
माइक लगाकर सोचो,
ताकि बहरे भी सुन सके.
ऐसा कैमरा लगाओ
जो अंधे भी देख सके.
न समझ में आये तो ऊँची बात हो गयी.
पर इतने ताम झाम वाली सोच ही सोच होती है.
तुम्हारी सोच किसी को नही दिखती.
क्या फर्क पड़ता है.

Friday, October 23, 2009

ग़रीब के घर दिवाली कब आएगी?

जब ग़रीब को दो वक़्त की रोटी ,
चैन से मिल जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दिवाली आएगी।
जब उसके बच्चों के चेहरे पर ,
ख़ुशियों की मुस्कान आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब को रोटी , कपड़ा और मकान जैसी सुविधाएं
आराम से मिल जाएंगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर लालटेन की जगह ,
बिजली की लाइट जलाई जाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब की चादर ,
उसके तन को पूरा ढक पाएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।
जब ग़रीब के घर में भी ,
खुशियों की बहार आएगी ,
तब ही ग़रीब के घर दीवाली आएगी।

I liked this original work by Gaurav Kumar Tak,Gwaliar
Hope you'll like it too.
his e-mail address is given underneath.

संपर्क: gauravtakswm@gmail.com